भीतर भीतर जलना
गीले उपले सा
खाली धुआं छोड़ता है
सब कुछ धुआं-धुआं
ना कुछ नज़र आये
ना कुछ नतीज़ा
खीझ की खांस और आंखे पानी पानी
अन्दर बस अधजला गोबर
आग को जलने दो ना
आग में सब पाक़ है!
रविवार, 21 नवंबर 2010
सोमवार, 8 नवंबर 2010
फासले मरहम से
किसी पुराने रस्ते
घर गालियों से गुजरते
छुआ छुई होती है
कुछ यादों से
अचानक जैसे पुराने बरतन
से धूल की परतें हटती हैं
स्टील से चमकते है बीते दिन
पुराने ज़ख़्म भी
वक़्त के धूल से भर
दुखते नहीं,अच्छे लगते हैं
ऐसा क्यूँ, ज़ख़्म तो ज़ख़्म हैं
पर शायद फासला
अहमियत बताता है
वरना ज़ख़्म मरहम क्यूँ लगते ?
घर गालियों से गुजरते
छुआ छुई होती है
कुछ यादों से
अचानक जैसे पुराने बरतन
से धूल की परतें हटती हैं
स्टील से चमकते है बीते दिन
पुराने ज़ख़्म भी
वक़्त के धूल से भर
दुखते नहीं,अच्छे लगते हैं
ऐसा क्यूँ, ज़ख़्म तो ज़ख़्म हैं
पर शायद फासला
अहमियत बताता है
वरना ज़ख़्म मरहम क्यूँ लगते ?
बुधवार, 27 अक्टूबर 2010
तल्ख़-तल्ख सा एक
क्या तुमने पूछा उससे
तू इतना तल्ख़ क्यों है?
वो चुप चाप यूँ घूमता-फिरता
मर्ज़ी भर के जीता है
अपने हिसाब से
चाहता है ज़िन्दगी ही चले उसके ढर्रे पे
तुम जिसको को कहते हो नाजायज़
वो सब जायज़ है उसके लिए
क्युकी उसने भी तो जायज़ को जायज़ कहा था
तब दबा-दबा के उसकी बातों को
जायज़ को ही नाजायज़ बना दिया
बेचारा भूल गया
जायज़ और नाजायज़ में फर्क!!!
तू इतना तल्ख़ क्यों है?
वो चुप चाप यूँ घूमता-फिरता
मर्ज़ी भर के जीता है
अपने हिसाब से
चाहता है ज़िन्दगी ही चले उसके ढर्रे पे
तुम जिसको को कहते हो नाजायज़
वो सब जायज़ है उसके लिए
क्युकी उसने भी तो जायज़ को जायज़ कहा था
तब दबा-दबा के उसकी बातों को
जायज़ को ही नाजायज़ बना दिया
बेचारा भूल गया
जायज़ और नाजायज़ में फर्क!!!
रविवार, 25 जुलाई 2010
आवारा जज़्बात
तकलीफों को उड़ायेंगे आवारगी में
फिक्र से दूर होने को
दूर हुए जज्बातों से
आवारा बनाया दिक्कतों ने
गर्दन छुपाये मस्ती के रेत में
शुतुरमुर्ग सा
लगने कुछ यूँ लगा है
दबने लगा हूँ खुद किसी
रेत में!
फिक्र से दूर होने को
दूर हुए जज्बातों से
आवारा बनाया दिक्कतों ने
गर्दन छुपाये मस्ती के रेत में
शुतुरमुर्ग सा
लगने कुछ यूँ लगा है
दबने लगा हूँ खुद किसी
रेत में!
मंगलवार, 20 जुलाई 2010
तुम्हारे जाने के बाद!
अब कौन आयेगा इस वीराने में
हवाएं सिसकती है,
टीस बिस्तर,तकिये,पलंग से
लेकर खिड़की तक झांकती है
धुंए सी घुली तन्हाई
जाने दर्द है
या तुम्हारी यादें
घुले-घुले कुछ बीते दिन
आज तक इस इस कमरे में
तुम्हारी महक बिखेरते है
तुम्हारे जाने के बाद!
हवाएं सिसकती है,
टीस बिस्तर,तकिये,पलंग से
लेकर खिड़की तक झांकती है
धुंए सी घुली तन्हाई
जाने दर्द है
या तुम्हारी यादें
घुले-घुले कुछ बीते दिन
आज तक इस इस कमरे में
तुम्हारी महक बिखेरते है
तुम्हारे जाने के बाद!
बुधवार, 30 जून 2010
चवन्नी-अठन्नी सा खर्च होता वक़्त
रोज़ कुछ लिखने-पढ़ने का मन करता है
पर अजीब आपाधापी है
चाह कर भी
कुछ ना कर पाने गम
किस क़दर परेशान करता है
बस वैसे ही परेशान होता हूँ
क्या करूँ?
नहीं होता वक़्त सोलह आने
चवन्नी-अठन्नी सा खर्च होता है
कुछ दफ्तर में,कुछ फोन पर,
कुछ कुछ लोगों को खुश करने को
इस दोहरी ज़िन्दगी में सर फटा-फटा
मुझे ना जाने कितनी गालियां
देता है,
सच है ये मेरी व्यथा है
देर रात घर पहुँच
खुद को पाने की कोशिश में
सर पे ठंडा तेल लगाऊं या
गले में वोडका डालूं
बेसुध होने तक
सर में टाँय-टाँय
शोर का तबला बजता ही रहता है
और बेसुधी के बाद
मन ही मन खुश हो लेता हूँ
कल लिखूंगा के साथ....
पर अजीब आपाधापी है
चाह कर भी
कुछ ना कर पाने गम
किस क़दर परेशान करता है
बस वैसे ही परेशान होता हूँ
क्या करूँ?
नहीं होता वक़्त सोलह आने
चवन्नी-अठन्नी सा खर्च होता है
कुछ दफ्तर में,कुछ फोन पर,
कुछ कुछ लोगों को खुश करने को
इस दोहरी ज़िन्दगी में सर फटा-फटा
मुझे ना जाने कितनी गालियां
देता है,
सच है ये मेरी व्यथा है
देर रात घर पहुँच
खुद को पाने की कोशिश में
सर पे ठंडा तेल लगाऊं या
गले में वोडका डालूं
बेसुध होने तक
सर में टाँय-टाँय
शोर का तबला बजता ही रहता है
और बेसुधी के बाद
मन ही मन खुश हो लेता हूँ
कल लिखूंगा के साथ....
रविवार, 27 जून 2010
तुम से दुरी का दर्द बह आया था उस दिन गंगा किनारे
पहाड़ नीला हुआ था
हिमालय की वादियाँ थी
गंगा की गूंजती लहरें
किनारे के चबूतरे पर
एक शादी हो रही थी,
काश तुम साथ होती उस दिन
यहाँ दिल्ली की लू से बाहर
पहुंचा था सुबह-सुबह,
गंगा किनारे बद्रीनाथ के करीब
लहराती गंगा के पास
रिसोर्ट के चबूतरे पर
बैठा-बैठा पहाड़ो से लटकते
पेड़ों में तुम्हे ही ढूंढ रहा था
काश उस दिन तुम साथ होती
गंगा के सामने जब दूल्हा
दुल्हन की मांग भर रहा था
दुल्हन ने ऑंखें मुंदी थी
ऐसा लगा जैसे उसने पूरी
कायनात सोंप दी हमसफ़र को
मेरी टक-टकी टूटी
ऑंखें मूँद ली मैने भी
सिहरन हुई थी सर से पैर तक
यूं लगा दूल्हा मैं दुल्हन तुम हो
इसी बीच पहाड़ों को बादलों ने घेरा था
झम-झामा-झम बदरा बरसे
तुम से दुरी का दर्द
बादलों के साथ बह आया था उस दिन
गंगा किनारे!!!!!!!!!!
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