परछाइयाँ धुप में
तेज़ हवा के झोंको में
लू के थपेड़ों के साथ
धुल बनके उड़ती हैं
कांपने लगती हैं तपिस में
प्यारे लम्हों की भी आदत है
परछाइयों सी
बेवफा हैं ये
ना तपिस में साथ
ना बगियाँ की छांव में
सुकून में साथ
ये ना गम की हमनवा है
ना ख़ुशी बांटे वो दिलरुबा
चलते-चलते मिले जो तुमसे
तो हाथ मिलाना
कोशिश करना
हो सके तो गले लगाना
ये कह ज़रूर देना
तेरा नाम परछाई किसने रखा
तू तो बेवफा है!
मंगलवार, 15 दिसंबर 2009
रविवार, 6 दिसंबर 2009
कूड़ावाली बच्ची
रोज़ की तरह आज का दिन निकला,वही आफत उठने पर!देर रात का सोना जल्दी जागना बड़ा परेशान कर देता है!ना स्टूडियो में सुकून मिलता है ना घर पे ना बाहर फिर भी खुद को शांत रख बेचैनी की लगाम अपने हाथ में रखता हूँ लेकिन आज इस इतवार कुछ अलग हो गया जो परेशान कर रहा है!
सुबह कुछ कपड़े प्रेस कराने थे सो नीचे को आया!प्रेस वाली के पास खड़ा था,वहां बहुत सारे आवारा कुत्ते घूम रहे थे!कुछ छोटे थे,कुछ मोटे थे,कुछ कीड़े पड़े भी थे!वहीँ पास ब्रेड पड़ा था उसे नोच नोच कर खा रहे थे!गली इतनी व्यस्त नहीं थी जितनी अमूमन होती है फिर भी खड़-खड़ करते पुराने स्कूटर सवार कुछ लोग, कुछ बाइक वाले तो कभी कभी कभार रिक्शे पर लक्ष्मी की नगर की सुन्दर लड़कियाँ सड़क से गुज़र रहीं थी!इसी बीच एक स्कूटर वाले का स्कूटर ख़राब हो गया,वो वहीँ बीच सड़क पर किक पे किक पेले जा रहा था,खींझ रहा था!अचानक वो सारे आवारा कुत्ते एक साथ भौंकने लगे थे,मुझे इसमे कुछ खास नहीं लगा!तभी प्रेस वाली मोटी अम्मा अपनी बेटी को बोली!
"देखियो रे उसको खा लिया क्या मुओं ने"
"उसने बोला हा अम्मी रो रही है"
मैंने भी देखा एक कूड़ा बिनने वाली बच्ची सड़क पे गिरी पड़ी रो रही थी,भी मुझे लगा नाटक कर रही है,लगे भी क्यों ना ये दिल्ली की तमाम रेडलाइट पर भीख मांगने वालों से मैं बड़ा परेशान हूँ,साले सब के सब भीख मंगाते है और जाकर नबी करीम से गांजा-चरस जरूर लेते हैं,खाना खाएं ना खाएं!इस कारण इन सारे भीखमंगो से चिढ हो गई है मुझे!ऐसे में मुझे लगा गिर के नाटक कर रही है काटा-वाटा नहीं कुत्ते ने,ये तो वैसे ही गली में फिरने वाले आवारा कुत्ते हैं डरपोक होते हैं क्या काटेंगे?
इतनी ही देर में वो रोती हुई उठी, इक पुराना घाघरा पहना था उसे उठाया!उसके पैर में खरोंच के साथ कुत्ते का एक दांत घुसने का निशान था!वो रो रही थी,हाँ रोते हुए किसी का परवाह नहीं कर रही थी!उसी गली में एक चाय वाला बैठता है वो आया!
"कहाँ काटा है दिखा मेरे को"
उसने कोई जवाब नहीं दिया!
"चल डॉक्टर के पास ले चलता हूँ"फिर भी कोई जवाब नहीं!
मैं वहीँ प्रेस वाली के पास खड़ा देख रहा था स्वार्थशून्य उसके चेहरे को!कूड़ा बीनने वाली वो बच्ची रो रही थी लेकिन दर्द के अलावा उसके सारे भाव सो रहे थे,चेहरे पे कुछ दिखाई नहीं दे रह था,डॉक्टर से इलाज करवाने का लालच भी नहीं था!जो दिख रहा था वो बिखरे हुए बाल,गन्दगी से अटा उसका शरीर और हाँ उसकी पूरी काया पर ढेर सारी मासूमियत!गली के चलने का सिलसिला भी जारी था!आते-जाते समझा रहे थे!
"तुम डंडी लेके चला करो वरना ये कुत्ते काट खायेंगे"
अब तक चाय वाला गया नहीं था उसको बोल रहा था चल डॉक्टर के पास ले चलता हूँ! इतनी देर तक मेरे अन्दर का एक इन्सान मुझे छोड़ चूका था,जो अकसर बेवजह के फड्डों से मुझे दूर रहने की नसीहत देता है!दूसरा इन्सान सक्रीय था जो कूड़ेवाली के पास तक गया,उस बच्ची का बांह भी पकड़ा और बोला!
"चली जा इसके (चाय वाले)साथ"
तब तक उस से भी छोटा एक भाई वंहा आ गया कुत्तों की भूंक की दहशत से भागा था और बच निकला था!मुझे लगा कूड़े वाली बच्ची शायद रोते रोते उसी को ढूंढ रही थी!अब भाई आया तो वो आवाज़ लगाने लगा एटा,एटा!मैं पूरा तो नहीं पर समझ गया था ये बंगला में बोल रहे हैं,बुला रहा था उधर गली की दूसरी तरफ खड़े एक और भाई को (कुल मिलाकर तीन) पर वो आ नहीं रहा था,जान बचने की जदोज़हद में उसका बोरा छूट गया था,और ऊपर से सांड जैसा मोटा कुत्ता अपने अमले के साथ बोरे के पास ही सुस्ता रहा था!यहाँ भी मेरे अन्दर के दूसरे वाले इन्सान ने थोड़ी हिम्मत दिखाई उसका बोरा पकड़ा और उसको अपने बहन और भाई के पास पहुंचा दिया फिर तीनों को लेकर चाय वाला चला गया!
इधर मेरे अन्दर का पहला इन्सान फिर जागा!
"चल भाई अब तो ये गए तू अपना काम देख!"
लेकिन थोड़ी देर बाद जब सूटेड-बूटेड हो ऑफिस को निकला उसी गली से तो मैं चाय वाले से पूछ बैठा!
"भाई उसको ले गए थे डॉक्टर के पास"
"ना भाईसाब उसको बीस तीस रुपये दे दिए थे मैंने"!
सुबह कुछ कपड़े प्रेस कराने थे सो नीचे को आया!प्रेस वाली के पास खड़ा था,वहां बहुत सारे आवारा कुत्ते घूम रहे थे!कुछ छोटे थे,कुछ मोटे थे,कुछ कीड़े पड़े भी थे!वहीँ पास ब्रेड पड़ा था उसे नोच नोच कर खा रहे थे!गली इतनी व्यस्त नहीं थी जितनी अमूमन होती है फिर भी खड़-खड़ करते पुराने स्कूटर सवार कुछ लोग, कुछ बाइक वाले तो कभी कभी कभार रिक्शे पर लक्ष्मी की नगर की सुन्दर लड़कियाँ सड़क से गुज़र रहीं थी!इसी बीच एक स्कूटर वाले का स्कूटर ख़राब हो गया,वो वहीँ बीच सड़क पर किक पे किक पेले जा रहा था,खींझ रहा था!अचानक वो सारे आवारा कुत्ते एक साथ भौंकने लगे थे,मुझे इसमे कुछ खास नहीं लगा!तभी प्रेस वाली मोटी अम्मा अपनी बेटी को बोली!
"देखियो रे उसको खा लिया क्या मुओं ने"
"उसने बोला हा अम्मी रो रही है"
मैंने भी देखा एक कूड़ा बिनने वाली बच्ची सड़क पे गिरी पड़ी रो रही थी,भी मुझे लगा नाटक कर रही है,लगे भी क्यों ना ये दिल्ली की तमाम रेडलाइट पर भीख मांगने वालों से मैं बड़ा परेशान हूँ,साले सब के सब भीख मंगाते है और जाकर नबी करीम से गांजा-चरस जरूर लेते हैं,खाना खाएं ना खाएं!इस कारण इन सारे भीखमंगो से चिढ हो गई है मुझे!ऐसे में मुझे लगा गिर के नाटक कर रही है काटा-वाटा नहीं कुत्ते ने,ये तो वैसे ही गली में फिरने वाले आवारा कुत्ते हैं डरपोक होते हैं क्या काटेंगे?
इतनी ही देर में वो रोती हुई उठी, इक पुराना घाघरा पहना था उसे उठाया!उसके पैर में खरोंच के साथ कुत्ते का एक दांत घुसने का निशान था!वो रो रही थी,हाँ रोते हुए किसी का परवाह नहीं कर रही थी!उसी गली में एक चाय वाला बैठता है वो आया!
"कहाँ काटा है दिखा मेरे को"
उसने कोई जवाब नहीं दिया!
"चल डॉक्टर के पास ले चलता हूँ"फिर भी कोई जवाब नहीं!
मैं वहीँ प्रेस वाली के पास खड़ा देख रहा था स्वार्थशून्य उसके चेहरे को!कूड़ा बीनने वाली वो बच्ची रो रही थी लेकिन दर्द के अलावा उसके सारे भाव सो रहे थे,चेहरे पे कुछ दिखाई नहीं दे रह था,डॉक्टर से इलाज करवाने का लालच भी नहीं था!जो दिख रहा था वो बिखरे हुए बाल,गन्दगी से अटा उसका शरीर और हाँ उसकी पूरी काया पर ढेर सारी मासूमियत!गली के चलने का सिलसिला भी जारी था!आते-जाते समझा रहे थे!
"तुम डंडी लेके चला करो वरना ये कुत्ते काट खायेंगे"
अब तक चाय वाला गया नहीं था उसको बोल रहा था चल डॉक्टर के पास ले चलता हूँ! इतनी देर तक मेरे अन्दर का एक इन्सान मुझे छोड़ चूका था,जो अकसर बेवजह के फड्डों से मुझे दूर रहने की नसीहत देता है!दूसरा इन्सान सक्रीय था जो कूड़ेवाली के पास तक गया,उस बच्ची का बांह भी पकड़ा और बोला!
"चली जा इसके (चाय वाले)साथ"
तब तक उस से भी छोटा एक भाई वंहा आ गया कुत्तों की भूंक की दहशत से भागा था और बच निकला था!मुझे लगा कूड़े वाली बच्ची शायद रोते रोते उसी को ढूंढ रही थी!अब भाई आया तो वो आवाज़ लगाने लगा एटा,एटा!मैं पूरा तो नहीं पर समझ गया था ये बंगला में बोल रहे हैं,बुला रहा था उधर गली की दूसरी तरफ खड़े एक और भाई को (कुल मिलाकर तीन) पर वो आ नहीं रहा था,जान बचने की जदोज़हद में उसका बोरा छूट गया था,और ऊपर से सांड जैसा मोटा कुत्ता अपने अमले के साथ बोरे के पास ही सुस्ता रहा था!यहाँ भी मेरे अन्दर के दूसरे वाले इन्सान ने थोड़ी हिम्मत दिखाई उसका बोरा पकड़ा और उसको अपने बहन और भाई के पास पहुंचा दिया फिर तीनों को लेकर चाय वाला चला गया!
इधर मेरे अन्दर का पहला इन्सान फिर जागा!
"चल भाई अब तो ये गए तू अपना काम देख!"
लेकिन थोड़ी देर बाद जब सूटेड-बूटेड हो ऑफिस को निकला उसी गली से तो मैं चाय वाले से पूछ बैठा!
"भाई उसको ले गए थे डॉक्टर के पास"
"ना भाईसाब उसको बीस तीस रुपये दे दिए थे मैंने"!
मंगलवार, 1 दिसंबर 2009
एक कच्ची सड़क पर
चित्र:साभार-विजय प्रताप सिंह
आज चलो ना मेरे गांव मेंएक कच्ची सड़क पर
जिसपे धूल उड़ा करती है
ठंड की पछुआ भी
इन्ही सडकों पर दिखा करती है
किनारे किनारे खेतों में फसलें,
खेत महकते हैं सड़क से गुजरते,
अरहर के दाल खाते हो ना
मैंने अरहर के पौधे की जवानी देखी है
खड़े होते हैं सारे
कुदरती डीओडरेंट लगाये
आपस में ठिठोली करते हैं
मैंने इनकी मस्ती देखी हैं
एक बगिया है आम की
इसी सड़क किनारे
एक पाठशाला,एक पोखर
दोनों साथ साथ हैं
छोटे छोटे बच्चे
बोरे पर बैठकर
पढ़ते हैं
पोखर में कागज़ की नाव चलाते हैं
खेल खेल में चिल्लाते है
बच्चों की किलकारी
हवा के झोंको पर बैठ
मेरे बरामदे तक
कभी तेज़ तो कभी मद्धिम हो आया करती है
मेरे कमरे के बाहर
घर से लगे खेत भी तो है
उसमे लगे मक्के के पत्तों
पर कभी बारिश की बूँदें गिरती है ना
तो हर ओर संगीत के साज़ बजते हैं
आ जाओ मेरे साथ
ले चलता हु तुम्हे
सड़क के पास वाली
घनी बगिया में
लटकी हुई एक टहनी पर
हम भी लटकेंगे!!!
सोमवार, 30 नवंबर 2009
नींद ने भी फटकारा
एक मुद्दत बीता सा लगता था
वरना ये दो चार साल क्या होते है
लिहाज़ के मारे
दिन ब दिन हमने रोज़ निकाले
वो कुछ लम्हें जिनके राज़दार
बस हम तुम
पर इन सालों में तुम्हारा तो नहीं पता
मेरा बहकने का सिलसिला मुझे याद है
उन हसीन लम्हों का होकर!
आज रात मौका भी आया
तो हम अकेले ही लरज़ते रहे
तुम निकल गई आगे बस हम अटके रहे
ना जाने कितने सवाल थे मेरे
तुमसे रूबरू हो पूछने को
एक खींझ थी,चोट खाए
अरमान थे सब ने मिल कर
सवालों के पुलिंदे बनाये थे
पर जब सामना तुमसे हुआ
मैंने,खुद ने खुद को धोखा दिया
तुमसे मिन्नत कर
और तो और अपने ही बनाये सवालों को ज़लील कर
उन्हें तुम्हारे सामने ही नहीं रखा
पागल सा तुम में वही ढूंढता रहा
जो तुमसे पाया करता था
तुम्हारे जाने के बाद भी
ज़बरदस्ती खुद को यकीन दिलाता रहा
तुम वही हो तुम वही हो तुम वही हो
रात बीती सहर का अजान सुरीला नहीं था
नींद जो भागी थी उन्ही लम्हों की खोज में
लोटी भी हैरान परेशान
मुझे देखा उसने सुबह ७ बजे तक
खुद को दिलासा देते हुए!
नींद ने भी फटकारा,कहा
मैं आई हूँ आगोश में आओ
उसको झटक दिया दिहाड़ी की फिक्र मैं
अनायास ही ज़हन कौंधा
तुम निकल गई आगे हम ही क्यों अटके रहे???
वरना ये दो चार साल क्या होते है
लिहाज़ के मारे
दिन ब दिन हमने रोज़ निकाले
वो कुछ लम्हें जिनके राज़दार
बस हम तुम
पर इन सालों में तुम्हारा तो नहीं पता
मेरा बहकने का सिलसिला मुझे याद है
उन हसीन लम्हों का होकर!
आज रात मौका भी आया
तो हम अकेले ही लरज़ते रहे
तुम निकल गई आगे बस हम अटके रहे
ना जाने कितने सवाल थे मेरे
तुमसे रूबरू हो पूछने को
एक खींझ थी,चोट खाए
अरमान थे सब ने मिल कर
सवालों के पुलिंदे बनाये थे
पर जब सामना तुमसे हुआ
मैंने,खुद ने खुद को धोखा दिया
तुमसे मिन्नत कर
और तो और अपने ही बनाये सवालों को ज़लील कर
उन्हें तुम्हारे सामने ही नहीं रखा
पागल सा तुम में वही ढूंढता रहा
जो तुमसे पाया करता था
तुम्हारे जाने के बाद भी
ज़बरदस्ती खुद को यकीन दिलाता रहा
तुम वही हो तुम वही हो तुम वही हो
रात बीती सहर का अजान सुरीला नहीं था
नींद जो भागी थी उन्ही लम्हों की खोज में
लोटी भी हैरान परेशान
मुझे देखा उसने सुबह ७ बजे तक
खुद को दिलासा देते हुए!
नींद ने भी फटकारा,कहा
मैं आई हूँ आगोश में आओ
उसको झटक दिया दिहाड़ी की फिक्र मैं
अनायास ही ज़हन कौंधा
तुम निकल गई आगे हम ही क्यों अटके रहे???
सोमवार, 16 नवंबर 2009
आज एक पाती तुम्हारे नाम-(मसूरी के गनहिल से लौटकर)
आज एक पाती तुम्हारे नाम-
याद है ना देवदार के इस पार हम
और उस पार दूर देश में बरफ़ का घर
कैसे चमक रहा था
छंटते-बढ़ते बादल
नक्कासी काढ रहे थे वहां दूर
उस बर्फीले तम्बू पर!
हम बैठे थे सबसे ऊँची छत पर
पत्थरों की कुर्शी बनाई
एक पर तुम बैठी एक पर मैं
मैं ज़ज्बातों में बहता
बौराया सा,घूरता कभी सफ़ेद
कभी हरे आसमां में घुसे टीलों को
और तुम झून्झलाती मुझ बौर पे!
कितनी सर्दी थी ना
हम दिल्लीवाले कैसे किड़क रहे थे कभी-कभी
बादल भी चेपू से
कभी जाते भी तो थोड़ी देर में लौट आते
गुस्से को अन्दर ही अन्दर चबाते
एक भी डांट नहीं सुनाई हमने बादलों को
सुनाते भी कैसे तब,आजू-बाजु वाले सब
यूँ ही तो कह रहे थे ये बादलों का डेरा है!
खामोशी की भी गूंज होती है
तभी तो पता चला था
कान सीं-सीं कर बज रहे थे
हमारी जुड़वाँ तन्हाई में
पता नहीं धोखे से घंटो कैसे बीते
क्यूंकि हमने तो इतनी कोशिश करी थी
वक़्त को थामने की!
खैर दगाबाज वक़्त ना ठहरा
ना सही
यादें तो अपनी हैं
जिनको इतने करीने से सजायी है मैंने तुम्हारे लिए!
इसलिए आज एक पाती तुम्हारे नाम----------
याद है ना देवदार के इस पार हम
और उस पार दूर देश में बरफ़ का घर
कैसे चमक रहा था
छंटते-बढ़ते बादल
नक्कासी काढ रहे थे वहां दूर
उस बर्फीले तम्बू पर!
हम बैठे थे सबसे ऊँची छत पर
पत्थरों की कुर्शी बनाई
एक पर तुम बैठी एक पर मैं
मैं ज़ज्बातों में बहता
बौराया सा,घूरता कभी सफ़ेद
कभी हरे आसमां में घुसे टीलों को
और तुम झून्झलाती मुझ बौर पे!
कितनी सर्दी थी ना
हम दिल्लीवाले कैसे किड़क रहे थे कभी-कभी
बादल भी चेपू से
कभी जाते भी तो थोड़ी देर में लौट आते
गुस्से को अन्दर ही अन्दर चबाते
एक भी डांट नहीं सुनाई हमने बादलों को
सुनाते भी कैसे तब,आजू-बाजु वाले सब
यूँ ही तो कह रहे थे ये बादलों का डेरा है!
खामोशी की भी गूंज होती है
तभी तो पता चला था
कान सीं-सीं कर बज रहे थे
हमारी जुड़वाँ तन्हाई में
पता नहीं धोखे से घंटो कैसे बीते
क्यूंकि हमने तो इतनी कोशिश करी थी
वक़्त को थामने की!
खैर दगाबाज वक़्त ना ठहरा
ना सही
यादें तो अपनी हैं
जिनको इतने करीने से सजायी है मैंने तुम्हारे लिए!
इसलिए आज एक पाती तुम्हारे नाम----------
बुधवार, 4 नवंबर 2009
फागुन की धूप में छत पर.....
सर्दी से सीली हुई रजाई
छत पर सुखाने धूप में,
मैं भी जाया करता था छत पर,
अब सालों बाद वो रजाई तो नहीं
पर कुछ सीली हुई सी यादें जरूर हैं!
अलसाये हुए होते दिन भी थोड़े-थोड़े,
सूखती रजाई की तह पे लेट,
ऑंखें थोड़ी खुली,थोड़ी मूंदी हुई सी
कुछ हसरतें भी सुखाया करते थे!
वो मालिस करती धुप
गुदगुदी और शुरूर दोनों भरा करती थी,
और हम नई जवानी के किनारे
अल्हड़ हो,सुखाते-सखाते ना जाने
किसकी गेसुओं में खो जाया करते थे!
सर्दी का गाँव भी बड़ा निराला था!
पीले-पीले फूल होते थे सरसों के,
बथुआ,पालक,मटर के लते,लगाते
पीले पर हरे का तड़का,
दिखता था ये सब साफ-साफ,
खेतों के बीच बसे मेरे घर की छत से.....
दिन तो अब भी होतें हैं पर वो नहीं
जो होते थे फागुन की धूप में छत पर.....
छत पर सुखाने धूप में,
मैं भी जाया करता था छत पर,
अब सालों बाद वो रजाई तो नहीं
पर कुछ सीली हुई सी यादें जरूर हैं!
अलसाये हुए होते दिन भी थोड़े-थोड़े,
सूखती रजाई की तह पे लेट,
ऑंखें थोड़ी खुली,थोड़ी मूंदी हुई सी
कुछ हसरतें भी सुखाया करते थे!
वो मालिस करती धुप
गुदगुदी और शुरूर दोनों भरा करती थी,
और हम नई जवानी के किनारे
अल्हड़ हो,सुखाते-सखाते ना जाने
किसकी गेसुओं में खो जाया करते थे!
सर्दी का गाँव भी बड़ा निराला था!
पीले-पीले फूल होते थे सरसों के,
बथुआ,पालक,मटर के लते,लगाते
पीले पर हरे का तड़का,
दिखता था ये सब साफ-साफ,
खेतों के बीच बसे मेरे घर की छत से.....
दिन तो अब भी होतें हैं पर वो नहीं
जो होते थे फागुन की धूप में छत पर.....
मंगलवार, 3 नवंबर 2009
नश्ल-नश्ल के लोग
इस कुनबे में ना जाने कितनी नश्ल के लोग रहते हैं!
तुम मिलो तो हैं तुम्हारे भाई!
मैं मिलूं तो मेरे बन जायेंगे!
सरको बस थोड़ी दूर गर सामने से,
प्यारे,गालियों की इनायत बरसाएंगे!
अब क्या कहें इनके बारे में,कहते हुए थक जायेंगे!
रहना सावधान,वरना बाबू,
आगे नहीं,पीछे से मुक्का लहरायेंगे!
समझो ना,इस कुनबे में कितनी नश्ल के लोग रहते हैं!
एक बेचारे वो भी हैं,इसी में,
सामने की तारीफ पर ललचायेंगे!
ना समझ खेल-खिलाडी की इन बातों को,
मुफ्त में मारे जायेंगे,
अब हम ही क्यूँ समझाएं,
समझे नहीं तो खुद ही फंस जायेंगे!
कम से कम अपने लिए ही सही,होशियार तो होना पड़ेगा!
क्यूंकि इन्ही दड़बों में उंच-नीच तमाम प्रयोग होते है!
समल्हना प्यारे,तुम्हारे बीच ही नश्ल-नश्ल के लोग रहते हैं!!!!!!!!
तुम मिलो तो हैं तुम्हारे भाई!
मैं मिलूं तो मेरे बन जायेंगे!
सरको बस थोड़ी दूर गर सामने से,
प्यारे,गालियों की इनायत बरसाएंगे!
अब क्या कहें इनके बारे में,कहते हुए थक जायेंगे!
रहना सावधान,वरना बाबू,
आगे नहीं,पीछे से मुक्का लहरायेंगे!
समझो ना,इस कुनबे में कितनी नश्ल के लोग रहते हैं!
एक बेचारे वो भी हैं,इसी में,
सामने की तारीफ पर ललचायेंगे!
ना समझ खेल-खिलाडी की इन बातों को,
मुफ्त में मारे जायेंगे,
अब हम ही क्यूँ समझाएं,
समझे नहीं तो खुद ही फंस जायेंगे!
कम से कम अपने लिए ही सही,होशियार तो होना पड़ेगा!
क्यूंकि इन्ही दड़बों में उंच-नीच तमाम प्रयोग होते है!
समल्हना प्यारे,तुम्हारे बीच ही नश्ल-नश्ल के लोग रहते हैं!!!!!!!!
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