सोमवार, 30 नवंबर 2009

नींद ने भी फटकारा


              एक मुद्दत बीता सा लगता था
              वरना ये दो चार साल क्या होते है
              लिहाज़ के मारे
              दिन ब दिन हमने रोज़ निकाले
              वो कुछ लम्हें जिनके राज़दार
              बस हम तुम
              पर इन सालों में तुम्हारा तो नहीं पता
              मेरा बहकने का सिलसिला मुझे याद है
              उन हसीन लम्हों का होकर!
              आज रात मौका भी आया
              तो हम अकेले ही लरज़ते रहे
              तुम निकल गई आगे बस हम अटके रहे
              ना जाने कितने सवाल थे मेरे
              तुमसे रूबरू हो पूछने को
              एक खींझ थी,चोट खाए
              अरमान थे सब ने मिल कर
              सवालों के पुलिंदे बनाये थे
              पर जब सामना तुमसे हुआ
              मैंने,खुद ने खुद को धोखा दिया
              तुमसे मिन्नत कर
              और तो और अपने ही बनाये सवालों को ज़लील कर
              उन्हें तुम्हारे सामने ही नहीं रखा
              पागल सा तुम में वही ढूंढता रहा
              जो तुमसे पाया करता था
              तुम्हारे जाने के बाद भी 
              ज़बरदस्ती खुद को यकीन दिलाता रहा           
              तुम वही हो तुम वही हो तुम वही हो                      
              रात बीती सहर का अजान सुरीला नहीं था
              नींद जो भागी थी उन्ही लम्हों की खोज में
              लोटी भी हैरान परेशान
              मुझे देखा उसने सुबह ७ बजे तक
              खुद को दिलासा देते हुए!
              नींद ने भी फटकारा,कहा
              मैं आई हूँ आगोश में आओ
              उसको झटक दिया दिहाड़ी की फिक्र मैं
              अनायास ही ज़हन कौंधा
              तुम निकल गई आगे हम ही क्यों अटके रहे???  

सोमवार, 16 नवंबर 2009

आज एक पाती तुम्हारे नाम-(मसूरी के गनहिल से लौटकर)


आज एक पाती तुम्हारे नाम-
याद है ना देवदार के इस पार हम
और उस पार दूर देश में बरफ़ का घर
कैसे चमक रहा था
छंटते-बढ़ते बादल
नक्कासी काढ रहे थे वहां दूर
उस बर्फीले तम्बू पर!

हम बैठे थे सबसे ऊँची छत पर
पत्थरों की कुर्शी बनाई
एक पर तुम बैठी एक पर मैं
मैं ज़ज्बातों में बहता
बौराया सा,घूरता कभी सफ़ेद
कभी हरे आसमां में घुसे टीलों को
और तुम झून्झलाती मुझ बौर पे!

कितनी सर्दी थी ना
हम दिल्लीवाले कैसे किड़क रहे थे कभी-कभी
बादल भी चेपू से
कभी जाते भी तो थोड़ी देर में लौट आते
गुस्से को अन्दर ही अन्दर चबाते
एक भी डांट नहीं सुनाई हमने बादलों को
सुनाते भी कैसे तब,आजू-बाजु वाले सब
यूँ ही तो कह रहे थे ये बादलों का डेरा है!

खामोशी की भी गूंज होती है
तभी तो पता चला था
कान सीं-सीं कर बज रहे थे
हमारी जुड़वाँ तन्हाई में
पता नहीं धोखे से घंटो कैसे बीते
क्यूंकि हमने तो इतनी कोशिश करी थी 
वक़्त को थामने की!

खैर दगाबाज वक़्त ना ठहरा
ना सही
यादें तो अपनी हैं
जिनको इतने करीने से सजायी है मैंने तुम्हारे लिए!
इसलिए आज एक पाती तुम्हारे नाम----------

बुधवार, 4 नवंबर 2009

फागुन की धूप में छत पर.....


सर्दी से सीली हुई रजाई
छत पर सुखाने धूप में,
मैं भी जाया करता था छत पर,
अब सालों बाद वो रजाई तो नहीं
पर कुछ सीली हुई सी यादें जरूर हैं!
                   अलसाये हुए होते दिन भी थोड़े-थोड़े,
                   सूखती रजाई की तह पे लेट,
                   ऑंखें थोड़ी खुली,थोड़ी मूंदी हुई सी
                   कुछ हसरतें भी सुखाया करते थे!
                   वो मालिस करती धुप
                   गुदगुदी और शुरूर दोनों भरा करती थी,
                   और हम नई जवानी के किनारे
                   अल्हड़ हो,सुखाते-सखाते ना जाने
                  किसकी गेसुओं में खो जाया करते थे!
सर्दी का गाँव भी बड़ा निराला था!
पीले-पीले फूल होते थे सरसों के,
बथुआ,पालक,मटर के लते,लगाते
पीले पर हरे का तड़का,
दिखता था ये सब साफ-साफ,
खेतों के बीच बसे मेरे घर की छत से.....
दिन तो अब भी होतें हैं पर वो नहीं
जो होते थे फागुन की धूप में छत पर.....

                  
              

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

नश्ल-नश्ल के लोग


इस कुनबे में ना जाने कितनी नश्ल के लोग रहते हैं!
              तुम मिलो तो हैं तुम्हारे भाई!
              मैं मिलूं तो मेरे बन जायेंगे!
              सरको बस थोड़ी दूर गर सामने से,
              प्यारे,गालियों की इनायत बरसाएंगे!
अब क्या कहें इनके बारे में,कहते हुए थक जायेंगे!
              रहना सावधान,वरना बाबू,
              आगे नहीं,पीछे से मुक्का लहरायेंगे!
समझो ना,इस कुनबे में कितनी नश्ल के लोग रहते हैं!
              एक बेचारे वो भी हैं,इसी में,
              सामने की तारीफ पर ललचायेंगे!
              ना समझ खेल-खिलाडी की इन बातों को,
              मुफ्त में मारे जायेंगे,
              अब हम ही क्यूँ समझाएं,
              समझे नहीं तो खुद ही फंस जायेंगे!
कम से कम अपने लिए ही सही,होशियार तो होना पड़ेगा!
क्यूंकि इन्ही दड़बों में उंच-नीच तमाम प्रयोग होते है!
समल्हना प्यारे,तुम्हारे बीच ही नश्ल-नश्ल के लोग रहते हैं!!!!!!!!

शनिवार, 31 अक्टूबर 2009

बिहारी से दिल्लीसेटवा तक


बिहार का सिवान स्टेशन खचाखच भरा हुआ था शायद वैशाली के आने का समय हो रहा था!स्टेशन पर लोग ही लोग थे! वैशाली एक्सप्रेस दिल्ली की तरफ आती है,स्टेशन पर लगा मेला भी दिल्ली आनेवालों का ही था! मेले में कुछ साफ सुथरे कपडे पहने सलीकेदार अंदाज़ में किनारे खड़े थे तो वहीँ ज्यादातर स्टेशन पर दरी बिछाये बैठे लेटे पड़े थे! हाँ जो साफ सुथरे नहीं थे उनका हुलिया बताना भी जरूरी है,ये वही लोग थे जिनको दिल्ली और आस-पास के शहरों ने एक ब्रांड से नवाज़ दिया है(बिहारी ब्रांड), हाँथ में झोरा(थैला),सर पर बोरा(सामान से भरा कट्टा),पास में रखा टीन का बक्सा!कपडे पहनने का अंदाज़-पैर में खरोच खाया हुआ चमड़े का जूता,५-७ साल पहले से इस्तेमाल हो रही जींस,ऊपर लटकता हुआ रंगीन कुरता,साथ में मेहरारू (पत्नी) और लईका (बेटा)!बड़े जोश में खड़े थे सब,गांव से दिल्ली जो जाना है!भोजपुरी में नहीं हिंदी में बतिया रहे थे!
      मैं इधर दिल्ली से जाने वाली वैशाली से उतरा सिवान स्टेशन पर,मेरे एक चचेरे चाचा हैं वो मेरा इंतजार कर रहे थे!मिटटी की खुशबू बड़ी प्यारी होती है मैं भी उस के रश में भाव-विभोर हो गया,जोश में हम भी बहार निकालने लगे,पर में चाचा भिनभिना रहे थे भीड़ से पर पाने में!एक भिनभिनाहट कुछ यूँ थी 'अरे इ सब दिल्ली सेटवा बसवा देले बाडन सा' मतलब दिल्लीसेट लोगों ने गंध मचा दिया है!मेने पुछा(भाई इ कहे कह तारा)एसा क्यों कह रहे हो ये तो यहीं अपने गाँव के लोग हैं!बड़े व्यंगातमक लहजे में जवाब मिला अरे सब जाके वहा जाके मजदूरी ही तो करते है साले दिल्लिसेट!!!!!!!में हैरत में पड़ गया क्योंकि मैं दिल्ली में स्तरहीन स्थानियों से मैले कुचले लोगों के लिए एक ही संबोधन सुना करता हूँ ,चल बिहारी कहीं का!!!तो क्या सिवान स्टेशन की वो भीड़ पाकिस्तान में गए भारतीय मुसलमानों (मोहाजिर) जैसी है???ना यहाँ के ना वहां के!!!!!!

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2009

मैं


मैं सम्पूर्ण नहीं हूँ,
पर मैं भी तो हूँ ना,
मैं इश्वर कब था,
मैं इश्वर कब हूँ?
फिर ये शोर क्यों?
सुधर जाओ-सुधर जाओ
की कर्कश आवाजें क्यों?

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2009

कराह

११ सितम्बर २००८ याद है मुझे, तब बिहार में बाढ़ की वजह से हरियाणा में थर्मल पॉवर प्लांट के लिए कोयले की आपूर्ति प्रभावित हो रही थी, उस दिन हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को प्रगति मैदान में किसी समरोह में शिरकत करने आना था! मेरा ऐसाईंमेंट था सीएम साहब को घेरना का,थर्मल पॉवर प्लांट में कोयले की कमी हो रही है बाढ़ की वजह से और सरकार के पास दूरदर्शी योजना क्यों नहीं,विषम परिस्थितियों में प्लांट को सुचारू रूप से चलाने की! मैंने कैमरामैन विद्या को साथ लिया,विद्या ने कैमरा इन्टर्न को साथ लिया और हम तीनो पहुंचे प्रगति मैदान!वहां सीएम साहब तो थे नहीं पर pwd मंत्री अजय यादव मिले उनसे ही सवाल-जवाब कर खानापूर्ति की!
वहां से ऑफिस के नीचे आया ही था की मनीष पांडे की कॉल आ गई,"आज सीपी में हूँ समय हो तो मिलिए".मैं भी राजी हो गया क्योंकि कई दिनों साथ बैठने का प्रोग्राम बन रहा था!मैंने रिकार्डिंग की टेप एक लड़के से ऑफिस में  दिया और निकल लिया मनीष जी के साथ!बाराखम्भा के सामने इनर सिर्किल में पेट्रोल पम्प के सामने दुकान है,बियर ली और गाड़ी वापस बाराखम्भा की और मोड़ लिए चूँकि वेस्टर्न कोर्ट जाना था!लालबत्ती पर ही खड़े थे की जोर का धमाका हुआ.कुछ समझ नहीं आया की क्या हुआ!इंडिगो हिचकोले खा गई थी!ज़मीन पे तो सन्नाटा छा गया पर असमान कबूतरों के चीख-पुकार से गूंजने लगा!सामने देखा तो बाराखम्भा बसस्टैंड के सामने इक्के दुक्के लोग भागा-दौड़ी कर रहे थे,आशंका हकीक़त में बदल गई!बाराखम्भा रोड पर ज़बरदस्त बम धमाका हुआ था!आव देखा ना ताव अनूप जी को कॉल करते दौड़ पड़ा की नीचे कैमरा भेजिए मैं हूँ ब्लास्ट हुआ है!स्पॉट पर पहुंचा वहां ओम्लेट जलने जैसी बू आ रही थी,इंसानों के जले अंग की बू थी!कोई कराह रहा था तो कोई सो गया था!कराह को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाउँगा क्योंकि उस कराह की कानजलाऊं आवाज़ मैंने ज़िन्दगी में पहली बार सुनी थी!ये सब देखकर पल भर के सन्न रहा फिर शुरू हुआ कैमरे के सामने माइक पकड़ कर पेशे का प्रबंधन!लगे रहे मेरे तमाम सहयोगी भी जो की मिनटों के अन्तराल में नीचे आ गए थे!ये,मैं कहानी नहीं लिख रहा पर पता नहीं क्यों कल से वो पूरा दर्दनाक वाकया आँखों के सामने घूम जा रहा है,वो बू भी नथुनों में घुसी सी जा रही है और वो अजीब कराह कानों में शोर कर रहा है!उस दिन से लेकर अबतक तो प्रोफेसनल था मैं, ये अजीब क्यूँ हो रहा है मेरे साथ???क्या उनके साथ भी कभी,वर्षों बाद ही सही होता होगा,जो इस पूरे दर्दनाक मंज़र का ताना बना रचते हैं??????????????????http://www.youtube.com/watch?v=JwRG03AIX_4&feature=related