सोमवार, 16 नवंबर 2009

आज एक पाती तुम्हारे नाम-(मसूरी के गनहिल से लौटकर)


आज एक पाती तुम्हारे नाम-
याद है ना देवदार के इस पार हम
और उस पार दूर देश में बरफ़ का घर
कैसे चमक रहा था
छंटते-बढ़ते बादल
नक्कासी काढ रहे थे वहां दूर
उस बर्फीले तम्बू पर!

हम बैठे थे सबसे ऊँची छत पर
पत्थरों की कुर्शी बनाई
एक पर तुम बैठी एक पर मैं
मैं ज़ज्बातों में बहता
बौराया सा,घूरता कभी सफ़ेद
कभी हरे आसमां में घुसे टीलों को
और तुम झून्झलाती मुझ बौर पे!

कितनी सर्दी थी ना
हम दिल्लीवाले कैसे किड़क रहे थे कभी-कभी
बादल भी चेपू से
कभी जाते भी तो थोड़ी देर में लौट आते
गुस्से को अन्दर ही अन्दर चबाते
एक भी डांट नहीं सुनाई हमने बादलों को
सुनाते भी कैसे तब,आजू-बाजु वाले सब
यूँ ही तो कह रहे थे ये बादलों का डेरा है!

खामोशी की भी गूंज होती है
तभी तो पता चला था
कान सीं-सीं कर बज रहे थे
हमारी जुड़वाँ तन्हाई में
पता नहीं धोखे से घंटो कैसे बीते
क्यूंकि हमने तो इतनी कोशिश करी थी 
वक़्त को थामने की!

खैर दगाबाज वक़्त ना ठहरा
ना सही
यादें तो अपनी हैं
जिनको इतने करीने से सजायी है मैंने तुम्हारे लिए!
इसलिए आज एक पाती तुम्हारे नाम----------

6 टिप्‍पणियां:

  1. यादें तो अपनी हैं
    जिनको इतने करीने से सजायी है मैंने तुम्हारे लिए!

    -सुन्दर रचना!

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  2. खैर दगाबाज वक़्त ना ठहरा
    ना सही
    यादें तो अपनी हैं
    जिनको इतने करीने से सजायी है मैंने तुम्हारे लिए!
    इसलिए आज एक पाती तुम्हारे नाम----------

    DHOOP, SARDI AUR BARAF SE CHURA KAR YAADON SE PUNI IK PAATI .... LAJAWAAB TAREEKE SE SANJOYA HAI INHE AAPNE .....

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  3. उम्दा..... लेकिन दोस्तों को छोड़ दिए और उन्हें जलाने के लिए मसूरी का गुणगान कर रहे हो ..... हमें भी ले जाना होगा... तब मिलकर कविता लिखेंगे..

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  4. यादें तो अपनी हैं
    जिनको इतने करीने से सजायी है मैंने तुम्हारे लिए!
    इसलिए आज एक पाती तुम्हारे नाम----------
    सुन्दर भाव

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  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  6. एक पाती तुम्हारे नाम-की...वाह......!!

    अच्छी लगी तुम्हारे नाम की ये पाती .....!!

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